Friday, May 25, 2007

इन्तजार

इस ज़माने से ना हम कोई गिला रखेंगे
दिल लगायेंगें तो ना शर्त-ए-वफ़ा रखेगें

ना दिखाएँगें कभी दिल पे लगे ज़ख़्म उनेहे
दर्द उठेगा मगर दिल को दबाए रखेंगें

जान दे देगें अगर एक इशारा कर दे
हम उसे अपने लिए भी ना बचा के रखेंगें

सब हटा देगें तेरी राह की रुकावट हमदम
घर के दरवज़ाय को हर वक़्त खुला रखगें

उनकी हर बात को भूले से ना भूलेंगें कभी
उनकी यादों को भी सीने से लगाए रखेंगें

टूट भी जाएगी उमीद जो तेरे आने की
एक दिया फिर भी हवाओं मैं जला के रखेंगें.

6 comments:

परमजीत सिहँ बाली said...

नीरज जी,इन्तजार पर लिखी आप रचना बहुत अच्छी लिखी है।बधाई।

जान दे देगें अगर एक इशारा कर दे
हम उसे अपने लिए भी ना बचा के रखेंगें

टूट भी जाएगी उमीद जो तेरे आने की
एक दिया फिर भी हवाओं मैं जला के रखेंगें.

Vikash said...

क्या ख़ूब दिया जलाया है आपने। और क्या कहूं, बहुत सुंदर रचना है। :)

Udan Tashtari said...

बढ़िया है.

Divine India said...

वेहद सुंदर पंक्तियों का मेल और जो अर्थ बना उसका कहना ही क्या…।

अभिनव said...

टूट भी जाएगी उमीद जो तेरे आने की
एक दिया फिर भी हवाओं मैं जला के रखेंगें.

बहुत बढ़िया।

Neeraj K. Rajput said...

बहुत बहुत सुक्रिया.