मैं अकेला तो नही था साथ थी मेरी तनहाइयाँ
कुछ उनका वजूद था कुछ थी मेरी परछाईयाँ
प्यार इस कदर बदनाम हो गया था मेरा यारों
की मुछ से पहले जाती थी मेरी रुसवाइयाँ
उसकी मधुर आवाज़ कानो मैं गूँजती थी कुछ इस तरह
जैसे चारों तरफ़ बज रही हों शहनाईयाँ
बेपनाह हुस्न था उनका ये माना हमने
मगर नापनी मुस्किल थी मेरे ईस्क की गहराइयाँ
मैने हर मोड़ पर वफ़ा की उसके साथ
ओर वफ़ा के बदले मुझे मिली सिर्फ़ बेवफ़ाइयां !
Wednesday, June 20, 2007
मैं ओर मेरी तनहाइयाँ
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4 comments:
मैने हर मोड़ पर वफ़ा की उसके साथ
ओर वफ़ा के बदले मुझे मिली सिर्फ़ बेवफ़ाइयां !
अरे मित्र हर एक को यही गलतफहमी होती है. वर्ना आप अच्छे तो जग अच्छा!
हां इश्क के मामले में कुछ और नियम हों तो पता नहीं.
आपने लिखा बहुत अच्छा है!
नीरज जी आप लिखते अच्छा हैं लेकिन आप वर्तनी कि गलतिया करते हैं , कृप्या उसे सुधार लीजिये ।
bahut khoob likha hai niks aapne.
Accha laga padkar.
Roja
मैने हर मोड़ पर वफ़ा की उसके साथ
ओर वफ़ा के बदले मुझे मिली सिर्फ़ बेवफ़ाइयां
निरज भाई ये कडी थोडा इस शीर्षक के साथ जमी नही यहा तन्हाई का जीक्र है धोखे का नही बाकी भाव अच्छे है।
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