ना जाने क्यूं इतने पंगे होते हैं
हमारे शहर हर रोज़ ही दंगे होते हैं
तेज़ चलती गाड़ियों के भीड़ मैं
ना जाने कितने कुचले जाते हैं
फिर लोग भड़क जाते हैं
ओर लाखों की सरकारी संपति को जाला कर ख़ाक करते हैं
सरकार तो जैसी है वैसी ही रहेगी
लोग बिना बात हे अपना दिमाक ख़राब करते हैं
क्या लोगो को सरकारी बसो को जलाने कर मज़ा आता है
या तोड़ फोड़ करने मैं सकूँ आता है
ये सब कर के लोग क्या जताना चाहते हैं
इस बेपरवा सरकार को क्या दिखाने चाहते हैं
अगर आप के पास सुझाव हो तो बता देना
नही तो हमारी तरह घटों तक ट्रेफ़िक जांम मैं मज़ा लेना.
Friday, August 10, 2007
दंगे ओर पंगे
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