हर पल खुदा से यही मांगता हूँ ,
सदा यूँ ही दुल्हन की तरह सजती रहो !
ना गम की परछाइयाँ आये कभी ,
सदा यूँ ही हंसती रहो !!
मैंने तो जोड़ लिया है तुमसे
दिल का रिश्ता ,
सदा यूँ ही
मेरे दिल में बसती रहो !!!
अब ना जी पाऊंगा
कभी तुम्हारे बिन ,
सदा यूँ ही
मुझसे प्यार करती रहो !!!!
Thursday, March 4, 2010
Friday, February 26, 2010
जब भी देखोगे मुझे इसी हाल में पाओगे,
जब भी देखोगे मुझे इसी हाल में पाओगे,
आँख में आँसू, लबों को हँसता हुआ पाओगे
तुम्हारा तो खैर यकीन है मुझे खुद से ज्यादा,
आँसू दिया है जब आज तो कल भी रुलाओगे
मेरा क्या है? एक अदना-सा आदमी ही तो हूँ
आखिर कब तक मुझे तुम याद रख पाओगे?
मुझे तो अपनी ख़ाक पर भी कोई हक़ नहीं,
हर उम्मीद है झूठी, क्यों कोई उम्मीद दिलाओगे?
आँख में आँसू, लबों को हँसता हुआ पाओगे
तुम्हारा तो खैर यकीन है मुझे खुद से ज्यादा,
आँसू दिया है जब आज तो कल भी रुलाओगे
मेरा क्या है? एक अदना-सा आदमी ही तो हूँ
आखिर कब तक मुझे तुम याद रख पाओगे?
मुझे तो अपनी ख़ाक पर भी कोई हक़ नहीं,
हर उम्मीद है झूठी, क्यों कोई उम्मीद दिलाओगे?
Friday, September 4, 2009
खामोश निगाहों का सपना तुम हो
खामोश निगाहों का सपना तुम हो,
जिसको भुला न सकूं, वो अपना तुम हो,
जिसकी हर बात, मेरी तन्हाईयों को छू ले,
सच ऐ ख्वाब, वो तुम हो,
वो तुम हो, वो तुम हो।
जिसकी धङकन की आवाज़,
सिर्फ मैं सुनूं ,दिन और रात,
जिसके आने की राह तकें,
ये आंखे बार-बार,
जिसकी खुशबू का पता,
बहारें मुझको दें जांए,
सच ऐ ख्वाब वो तुम हो,
वो तुम हो वो तुम हो।
जिसका अफसाना मेरे हयात के,
पैमाने में भरा हो,
जिसको पी कर मेरा गम भी,
दीवाना बन गया हो,
मेरे माज़ी के हर पन्ने पे,
लिखी जिसकी दास्तां,
सच ऐ ख्वाब, वो तुम हो,
वो तुम हो वो तुम हो।
जिसको भुला न सकूं, वो अपना तुम हो,
जिसकी हर बात, मेरी तन्हाईयों को छू ले,
सच ऐ ख्वाब, वो तुम हो,
वो तुम हो, वो तुम हो।
जिसकी धङकन की आवाज़,
सिर्फ मैं सुनूं ,दिन और रात,
जिसके आने की राह तकें,
ये आंखे बार-बार,
जिसकी खुशबू का पता,
बहारें मुझको दें जांए,
सच ऐ ख्वाब वो तुम हो,
वो तुम हो वो तुम हो।
जिसका अफसाना मेरे हयात के,
पैमाने में भरा हो,
जिसको पी कर मेरा गम भी,
दीवाना बन गया हो,
मेरे माज़ी के हर पन्ने पे,
लिखी जिसकी दास्तां,
सच ऐ ख्वाब, वो तुम हो,
वो तुम हो वो तुम हो।
Friday, July 10, 2009
दिल में छुपा रखा है तुझे याद बना के
दिल में छुपा रखा है तुझे याद बना के
कभी सांसों का हौसला कभी फरियाद बना के
हर एक कोने को रौशन किया तस्वीर से तेरी
तेरी हर बात ने छोडा मुझे बर्बाद बना के
आसमां ना गुमां कर ले रात की चांदनी पे कही
तभी तो ज़मीं पे उतारा गया है तुझे चाँद बना के
मै नए साल में क्या पेश करू तोहफतन तुझको
हर धड़कन को भेजा है मुबारकबाद बना के
एक ख्वाब सच हो वरना इन बातों का क्या है
कल ख्वाब में देखा खुद को तेरा नौशाद बना के
यह क्या रंग ज़िन्दगी का दिखाते हो 'शाहंशाह'
तुम खुद ही रूठ गए सभी को शाद बना के
कभी सांसों का हौसला कभी फरियाद बना के
हर एक कोने को रौशन किया तस्वीर से तेरी
तेरी हर बात ने छोडा मुझे बर्बाद बना के
आसमां ना गुमां कर ले रात की चांदनी पे कही
तभी तो ज़मीं पे उतारा गया है तुझे चाँद बना के
मै नए साल में क्या पेश करू तोहफतन तुझको
हर धड़कन को भेजा है मुबारकबाद बना के
एक ख्वाब सच हो वरना इन बातों का क्या है
कल ख्वाब में देखा खुद को तेरा नौशाद बना के
यह क्या रंग ज़िन्दगी का दिखाते हो 'शाहंशाह'
तुम खुद ही रूठ गए सभी को शाद बना के
Thursday, June 18, 2009
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झू�¤ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झू�¤ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
Thursday, May 28, 2009
कबीर अगर तुम न हुए होते
कबीर अगर तुम न हुए होते
होते हम कितने निर्लज्ज और निष्ठुर
तुम्हारी वाणियां और साखियां
बार-बार स्मरण कराती हैं
आदमी का कद
कितना ओछा हो सकता है.
कबीर अगर तुम न हुए होते
तो होता केवल
मिथ्या जगत
तुम ही हो बटरोही
बनकर मार्ग दर्शक
आज भी अटल खड़े, अड़े हो
अड़ी हैं तुम्हारी
उलटबांसियां
सुलटा रही हैं दुष्कर्म
और दिवा स्वप्नों का
अंधेरा
हटा रही हैं पथ के कंकड़.
कबीर अगर तुम न हुए होते
नहीं होते गांधी
सत्य की लड़ाई के
योद्धा कहां खड़े होते
इस निरही जन जंगल में
कबीर अगर तुम न हुए होते
यह संसार उलझा ही रहता
उलट-पुलट हुआ रहता
मर्यादाओं को भंग करता
भीतर के तीरथ को जाने,
कितना और तिरोहित करता
कबीर अगर तुम न हुए होते
धागे कितने टूटे होते
रंग कितने बिखरे होते
ढाई आखर अपने पर रोते
कबीर अगर तुम न हुए होते
कुटिया गरीब की सूनी होती
सन्नाटा, विक्षोभ, वीराना
हर घर पर छाया होता
अगन लगी होती हर घर में
कौन बुझाने वाला होता।
----
फारूक आफरीदी
होते हम कितने निर्लज्ज और निष्ठुर
तुम्हारी वाणियां और साखियां
बार-बार स्मरण कराती हैं
आदमी का कद
कितना ओछा हो सकता है.
कबीर अगर तुम न हुए होते
तो होता केवल
मिथ्या जगत
तुम ही हो बटरोही
बनकर मार्ग दर्शक
आज भी अटल खड़े, अड़े हो
अड़ी हैं तुम्हारी
उलटबांसियां
सुलटा रही हैं दुष्कर्म
और दिवा स्वप्नों का
अंधेरा
हटा रही हैं पथ के कंकड़.
कबीर अगर तुम न हुए होते
नहीं होते गांधी
सत्य की लड़ाई के
योद्धा कहां खड़े होते
इस निरही जन जंगल में
कबीर अगर तुम न हुए होते
यह संसार उलझा ही रहता
उलट-पुलट हुआ रहता
मर्यादाओं को भंग करता
भीतर के तीरथ को जाने,
कितना और तिरोहित करता
कबीर अगर तुम न हुए होते
धागे कितने टूटे होते
रंग कितने बिखरे होते
ढाई आखर अपने पर रोते
कबीर अगर तुम न हुए होते
कुटिया गरीब की सूनी होती
सन्नाटा, विक्षोभ, वीराना
हर घर पर छाया होता
अगन लगी होती हर घर में
कौन बुझाने वाला होता।
----
फारूक आफरीदी
Sunday, May 17, 2009
उल्टी नगरी
उल्टी नगरी एक अनोखी, वस्तु जहाँ की उल्टी पुलटी.
उल्टी दुनिया उल्टा पर्वत्, उल्टे पेड़ चिमनिया उल्टी.
देती दूध चींटियाँ ख़्ररहे हल खींचे, चूहे हलवाहे.
पैसा दुर्लभ, सुलभ अशरफ़ी, भोजन सबको खाना चाहे.
दाड़ी मूंछ रखें औरतें, मर्द खिलाते घर मे बच्चे.
रहते लोगों मे मकान ही, झूठे जीते मरते सच्चे.
सर पर जूता पगड़ी पेरो में, मच्छ्रर की है बनी सवारी.
दिंन मे चाँद चमकता, सूरज सारी रात करे उजियारा.
जलता पानी, आग बुझाती, चलते सर के बल नर नारी.
छपपर तो ज़मीन पर रहता, घोड़ा पीछे आगे गाड़ी.
नाव चलाते मरुस्थलों मे, सांझ जागते सोते तड़के.
पाँच बरस तक रहते बूढ़े, साठ बरस मे बनते लड़के.
सुनती आँख कान देखते, नीक बाबू कुर्सी उपर.
चद जाती पहाड़ पर नदियाँ, सिंधु झील से निकल निकल कर.
एक बात का वहन बड़ा सुख, पड़ते गुरु पदाते चेले.
मौज उड़ाते बेथे भिखारी, शहंशाह चलाते ठेले.
रही ज्यू के टयूँ रह जाते और चला करती है डगरी.
उल्टी सारी वस्तु जहाँ की देखी ऐसी उल्टी नगरी.
उल्टी दुनिया उल्टा पर्वत्, उल्टे पेड़ चिमनिया उल्टी.
देती दूध चींटियाँ ख़्ररहे हल खींचे, चूहे हलवाहे.
पैसा दुर्लभ, सुलभ अशरफ़ी, भोजन सबको खाना चाहे.
दाड़ी मूंछ रखें औरतें, मर्द खिलाते घर मे बच्चे.
रहते लोगों मे मकान ही, झूठे जीते मरते सच्चे.
सर पर जूता पगड़ी पेरो में, मच्छ्रर की है बनी सवारी.
दिंन मे चाँद चमकता, सूरज सारी रात करे उजियारा.
जलता पानी, आग बुझाती, चलते सर के बल नर नारी.
छपपर तो ज़मीन पर रहता, घोड़ा पीछे आगे गाड़ी.
नाव चलाते मरुस्थलों मे, सांझ जागते सोते तड़के.
पाँच बरस तक रहते बूढ़े, साठ बरस मे बनते लड़के.
सुनती आँख कान देखते, नीक बाबू कुर्सी उपर.
चद जाती पहाड़ पर नदियाँ, सिंधु झील से निकल निकल कर.
एक बात का वहन बड़ा सुख, पड़ते गुरु पदाते चेले.
मौज उड़ाते बेथे भिखारी, शहंशाह चलाते ठेले.
रही ज्यू के टयूँ रह जाते और चला करती है डगरी.
उल्टी सारी वस्तु जहाँ की देखी ऐसी उल्टी नगरी.
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